Thursday, January 15, 2026
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रायगढ़ ने खोया अपनी सांस्कृतिक पहचान का स्तंभ: नहीं रहे रायगढ़ के प्रख्यात कला गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर ‘बेदम’…

रायगढ़। कला और संगीत की साधना में जीवन अर्पित करने वाले चक्रधर सम्मान सम्मानित प्रख्यात संगीत गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर का निधन हो गया। उन्होंने 97 वर्ष की आयु में अपने निवास स्थान पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से रायगढ़ के सांस्कृतिक और कलात्मक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

संगीत और साधना का एक युग समाप्त

गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर का जीवन पूरी तरह से संगीत साधना को समर्पित रहा। उन्होंने तबला, गायन और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देकर रायगढ़ को सांस्कृतिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया। वे केवल एक गुरु नहीं, बल्कि एक परंपरा के संवाहक थे, जिनकी शिक्षा ने कई पीढ़ियों को कला की राह दिखाई।

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान

वेदमणि सिंह ठाकुर को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रतिष्ठित “चक्रधर सम्मान” से सम्मानित किया गया था। इसके साथ ही उन्हें संगीत शिरोमणि सम्मान और राज्य अलंकरण सम्मान भी प्राप्त हुए थे। उनका संगीत केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, अपितु साधना और आत्मा की अभिव्यक्ति थी।

फिल्मों से मिला था प्रस्ताव, लेकिन चुनी तपस्वी राह

बताया जाता है कि वर्ष 1970 में वे मुंबई फिल्म जगत से जुड़ सकते थे। परंतु उनके पिता, प्रसिद्ध पखावज वादक पं. जगदीश सिंह ने उन्हें यह कहते हुए रोका कि “संगीत हमारे लिए कमाई नहीं, तपस्या है।” गुरु ठाकुर ने ताउम्र इस विचारधारा को आत्मसात किया।

चक्रधर समारोह के स्तंभ

गुरु ठाकुर कई वर्षों तक चक्रधर समारोह के मंच पर अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते रहे। गणेश वंदना हो या तबला वादन—उनकी कला में परंपरा, अनुशासन और आत्मा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। चक्रधर समारोह उनके बिना अधूरा माना जाता था।

संस्कार देने वाले गुरु

उन्होंने दर्जनों विद्यार्थियों को संगीत की बारीकियाँ सिखाईं।उनके शिष्यों ने न केवल रायगढ़, बल्कि पूरे देश/ विदेश में उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया। संगीत और मूल्य शिक्षा के वे जीते-जागते उदाहरण थे।

गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर के अनेक शिष्य आज विदेशों में भी संगीत का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उन्होंने रायगढ़ में गुरुजी से शिक्षा प्राप्त की और अब विदेशों में अपने संगीत विद्यालय स्थापित कर, भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचा रहे हैं।

श्रद्धांजलि में रायगढ़ की आंखें नम

उनके निधन पर रायगढ़ के सांस्कृतिक, कलात्मक और सामाजिक जगत में शोक की लहर है। उनके शिष्य कमल शर्मा ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि “गुरुजी का जाना केवल व्यक्ति विशेष की नहीं, एक पूरी परंपरा की क्षति है।”

“गुरु वेदमणि सिंह ठाकुर जैसे साधकों का जाना केवल एक जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक युग का अवसान होता है। उनका संगीत, उनका अनुशासन, और उनकी साधना आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।”

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