Thursday, January 15, 2026
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रायगढ़ के गौरमुड़ी में इंसानों की तरह हाथी शावक का दशकर्म: पूजा, शुद्धिकरण और 200 ग्रामीणों की उपस्थिति में अंतिम श्रद्धांजलि…

रायगढ़। तमनार रेंज के गौरमुड़ी गांव में तालाब में डूबकर मरे हाथी शावक के लिए ग्रामीणों ने ऐसा अनोखा और भावुक आयोजन किया, जिसने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। बुधवार की सुबह गांव के तालाब किनारे शावक की आत्मा की शांति और तालाब के शुद्धिकरण के लिए हिंदू रीति-रिवाज़ के साथ दशकर्म कराया गया। इस आयोजन में दो सौ से अधिक ग्रामीण शामिल हुए और सामूहिक भोज ग्रहण कर मृत शावक को श्रद्धांजलि दी।

घटना 24 नवंबर की रात की है, जब तमनार रेंज में 34 हाथियों का एक बड़ा दल लगातार घूम रहा था। पानी पीने के लिए यह दल गौरमुड़ी गांव के तालाब पर पहुंचा, जहां दल में शामिल एक हाथी शावक का पैर फिसल गया और वह पानी में डूब गया। शावक की मौके पर ही मौत हो गई। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम ने पहुंचकर पोस्टमार्टम कराया और शावक का दाहसंस्कार भी किया।

शावक की मौत के बाद हाथियों का झुंड कई दिनों से इसी क्षेत्र में बार-बार लौट रहा है और खेतों व गांव के आसपास नुकसान भी पहुंचा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि फसलों को भारी क्षति हुई है और हाथियों का आक्रोश लगातार बढ़ता दिख रहा है। स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि शावक की मृत्यु के बाद झुंड असामान्य व्यवहार कर रहा है, जिसके चलते गांव में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है।

इसी स्थिति को देखते हुए ग्रामीणों ने आपसी सहमति से निर्णय लिया कि हाथी शावक की आत्मा की शांति के लिए इंसानों की तरह दसवें दिन दशकर्म किया जाए। ग्रामीणों का मानना है कि हाथी देवतुल्य माना जाता है और उसके बच्चे की मृत्यु से उत्पन्न अशांति को दूर करने के लिए यह आयोजन जरूरी था। समारोह तालाब के पास ही संपन्न हुआ, जहां मंत्रोच्चार, पूजन-विधि और शुद्धिकरण किया गया। आयोजन में शामिल गांववासियों ने बताया कि शावक की मौत के बाद उन्होंने तालाब में निस्तारी करना भी बंद कर दिया था।

गांव के बुजुर्गों ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल धार्मिक रिवाज़ नहीं, बल्कि मानव और वन्यजीवों के बीच सम्मान और संवेदनशीलता का संदेश भी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस कर्मकांड के बाद क्षेत्र में शांति लौटेगी और हाथियों का व्यवहार भी सामान्य होगा। गौरमुड़ी गांव के इस अनोखे दशकर्म ने एक बार फिर यह साबित किया है कि ग्रामीण समाज आज भी प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति गहरी आस्था और करुणा रखता है।

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