Monday, March 2, 2026
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क्या ज्वेलरी सेक्टर बनेगा बजट 2026 की अग्निपरीक्षा? : कर नीति बनाम सामाजिक यथार्थ…

• पंडित कान्हा शास्त्री (ज्योतिष एवं वास्तु परामर्शदाता)…

रायगढ़। केंद्रीय बजट 2026-27 ऐसे समय आ रहा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था उपभोग और निवेश के बीच संतुलन खोज रही है। इस विमर्श के केंद्र में आज जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर खड़ा है-एक ऐसा उद्योग जो केवल विलासिता का प्रतीक नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भारत में सोना आभूषण मात्र नहीं, बल्कि संकट में काम आने वाली पूंजी, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक स्थिरता का आधार भी रहा है। लगातार बढ़ती सोने की कीमतों और ऊँचे कर ढांचे ने इस पारंपरिक मांग को दबाव में डाल दिया है। आयात पर भारी शुल्क और ज्वेलरी पर 3 प्रतिशत जीएसटी ने गहनों को मध्यम वर्ग की पहुंच से दूर करने का काम किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि मांग घट रही है, कारीगरों का काम सिकुड़ रहा है और असंगठित क्षेत्र पर सीधा असर पड़ रहा है। सवाल यह नहीं है कि सोना सस्ता होना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या कर नीति सामाजिक यथार्थ के अनुरूप है।

इंपोर्ट ड्यूटी में संभावित कटौती को केवल राजस्व हानि के चश्मे से देखना एक संकीर्ण दृष्टि होगी। यदि कच्चे माल की लागत घटती है तो घरेलू बिक्री बढ़ेगी, निर्यात को गति मिलेगी और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। यह राजस्व का नुकसान नहीं, बल्कि कर आधार के विस्तार का अवसर हो सकता है। यही आर्थिक नीति की दूरदृष्टि की असली कसौटी है। इसी तरह ज्वेलरी पर जीएसटी में राहत का प्रश्न केवल उपभोक्ता लाभ तक सीमित नहीं है। यह उस मध्यवर्ग से जुड़ा है, जिसकी क्रय शक्ति बीते वर्षों में महंगाई और कर बोझ से प्रभावित हुई है। टैक्स में मामूली कमी बाजार में विश्वास लौटाने का माध्यम बन सकती है। आर्थिक गतिविधि तभी बढ़ती है जब उपभोक्ता भविष्य को लेकर आश्वस्त हो।

बजट में यदि रेगुलेटेड ईएमआई व्यवस्था को स्थान मिलता है तो यह ज्वेलरी सेक्टर में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन को भी बढ़ावा दे सकता है। यह मांग दर्शाती है कि उद्योग अब केवल बिक्री नहीं, बल्कि वित्तीय सुधार की दिशा में भी सोच रहा है। सबसे महत्वपूर्ण विमर्श देश में उपलब्ध घरेलू सोने को आर्थिक चक्र में लाने का है। घरों में जमा अनुमानित हजारों टन सोना यदि रीसाइक्लिंग और औपचारिक प्रणाली में आता है, तो आयात निर्भरता घटेगी और चालू खाते पर दबाव कम होगा। यह नीति ‘उपभोग बनाम आत्मनिर्भरता’ के संतुलन का उदाहरण बन सकती है।

अंततः प्रश्न यही है कि क्या बजट 2026–27 सोने को केवल आयातित विलासिता मानेगा या उसे भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करेगा। जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर पर लिया गया निर्णय दरअसल सरकार की उस आर्थिक सोच का संकेत होगा, जिसमें कर नीति सिर्फ आंकड़ों का खेल है या सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से जुड़ा संवेदनशील हस्तक्षेप।

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